
कल-कल बहने वाली यमुना आज तिल-तिल कर मर रही है। यह सिर्फ एक नदी के मरने की कहानी नहीं, हमारे जीवन के संस्कारों और रीति रिवाजों की भी मौत है। आज नदी के असमय जाने से हमारे अपने मुक्ति को तरस रहे हैं। यहां अब नदी किनारे अंतिम संस्कार के कर्म भी पूरे नहीं हो पा रहे। बेबसी ऐसी है कि शव जलाने के बाद लोग अस्थियों को रेत में दबा रहे हैं, ताकि दो महीने बाद जब यमुना में जल आए तो हमारे अपनों के अवशेष खुद नदी में मिल जाएं। लेकिन जब तक यह सूखी और बेजान है, तब तक पितरों को मुक्ति नसीब नहीं होगी।
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